प्रदेश में 23 प्रसूताओं की मौतों के बाद सरकार की नींद खुली और राज्य स्तर पर प्रसूता निरीक्षण शुरू किया गया. अभियान में 4 हजार अस्पतालों का निरीक्षण किया गया. इसमें प्रदेश की गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ा चौंकाने वाला तथ्य सामने आया. 1 लाख 6 हजार से अधिक गर्भवती महिलाओं की जांच की गई, जिसमें 15 हजार महिलाएं हाई रिस्क प्रेग्नेंसी वाली पाई गईं. यानी प्रदेश में हर छठी गर्भवती की हालत नाजुक है.
राजस्थान में 15 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं की डिलीवरी से पहले ही जच्चा और बच्चा का जीवन जोखिम में है. यह चौंकाने वाला खुलासा गर्भवती महिलाओं को समयबद्ध और गुणवत्तापूर्ण प्रसवपूर्व सेवाएं सुनिश्चित करने के लिए चलाए गए सघन निरीक्षण अभियान में हुआ. दो दिनों में 1 लाख 6 हजार 264 गर्भवती महिलाओं की जांच की गई. इनमें 15 हजार 504 महिलाएं हाई रिस्क प्रेग्नेंसी वाली पाई गईं. अभियान के दौरान प्रदेशभर के 3 हजार 808 स्वास्थ्य संस्थानों का निरीक्षण किया गया. साथ ही 6 हजार 794 गर्भवती महिलाओं का रियल-टाइम सत्यापन और साक्षात्कार कर मातृ स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता का आकलन किया गया.
प्रदेश में गर्भवती महिलाओं के सघन निरीक्षण अभियान में करीब 86 हजार स्वास्थ्यकर्मी जुटे हुए हैं. अभियान की निगरानी जिला स्तर से लेकर ब्लॉक और फील्ड स्तर तक की जा रही है. प्रमुख सचिव के अनुसार जिला स्तर पर सीएमएचओ और जिला प्रजनन एवं शिशु स्वास्थ्य अधिकारी, जबकि ब्लॉक स्तर पर ब्लॉक सीएमएचओ और संबंधित चिकित्सा अधिकारी मॉनिटरिंग कर रहे हैं. अभियान में 10 हजार 49 सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी (CHO), 22 हजार 355 एएनएम और 54 हजार 431 आशा सहयोगिनियां गांव-गांव और ढाणी-ढाणी तक पहुंचकर गर्भवती महिलाओं का निरीक्षण और स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित कर रही हैं.
प्रसूताओं की मौतों को रोकने के लिए सरकार ने अभियान तो शुरू कर दिया. दूसरी ओर स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर दो दिन के भीलवाड़ा और बांसवाड़ा दौरे पर हैं. वहीं, 23 प्रसूताओं की मौत के बाद भी कई बड़े स्वास्थ्य अधिकारी फील्ड में नजर नहीं आए. प्रमुख सचिव, संयुक्त सचिव, डायरेक्टर, सीएमएचओ, पीएमओ, आरसीएचओ, ब्लॉक सीएमएचओ, स्थानीय चिकित्सा अधिकारी और ब्लॉक व पीएचसी सुपरवाइजर स्तर के अधिकारी समीक्षा बैठकों तक ही सीमित रहे.