राजस्थान में पिछले छह साल में ओबीसी आबादी के आंकड़ों में बड़ा बदलाव सामने आया है. पिछली सरकार के दौरान सरकारी दस्तावेजों में ओबीसी आबादी 52 प्रतिशत दर्ज की गई थी, जो अब घटकर करीब 43 प्रतिशत बताई जा रही है. यानी पुराने आंकड़ों की तुलना में करीब 9 प्रतिशत की कमी दिखाई दे रही है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश की कुल आबादी करीब 8 करोड़ 38 लाख है. वहीं, ओबीसी वर्ग को लंबे समय से प्रदेश की लगभग आधी आबादी माना जाता रहा है. वर्ष 2019 में विधानसभा में एमबीसी को 5 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने के दौरान 52 प्रतिशत ओबीसी आबादी का आंकड़ा भी प्रस्तुत किया गया था. उस समय यह आंकड़ा राजस्थान ओबीसी आयोग की ओर से तैयार किया गया था. वहीं अब ओबीसी प्रतिनिधित्व आयोग के आंकड़ों में ओबीसी आबादी करीब 43 प्रतिशत बताई गई है, जो लगभग 3.59 करोड़ के आसपास बैठती है. आंकड़ों में इस बड़े अंतर को लेकर सवाल उठने लगे हैं कि आखिर सही आंकड़ा कौन-सा है. क्या पिछली सरकार के दौरान तैयार किए गए ओबीसी आयोग के आंकड़े सही थे या फिर वर्तमान ओबीसी प्रतिनिधित्व आयोग के आंकड़े. वहीं, विपक्ष ने ओबीसी प्रतिनिधित्व आयोग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े किए हैं.
आरोप- दौसा के 100 से ज्यादा गांवों में सर्वे के लिए टीमें नहीं पहुंचीं
OBC आबादी के आंकड़ों में कमी आने से आरक्षित होने वाली सीटों की संख्या पर भी भारी असर पड़ सकता है. हालांकि, पहले की तुलना में सीटों में कितना बदलाव होगा, इसकी तस्वीर आरक्षण की लॉटरी के बाद ही साफ होगी. गौरतलब है कि प्रदेश में ओबीसी को पहले भी करीब 17-18 प्रतिशत आरक्षण मिलता रहा है. वहीं, किसान नेता हिम्मत सिंह गुर्जर ने दावा किया है कि दौसा के 100 से अधिक गांवों में पड़ताल के दौरान सामने आया कि OBC बाहुल्य परिवारों का सर्वे करने के लिए कोई टीम नहीं पहुंची. उन्होंने सर्वे के आंकड़ों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए हैं.
परेशानी कहां- ओबीसी परिवारों का पलायन और डाटा में दोहराव
OBC परिवारों के पलायन के साथ-साथ डाटा में दोहराव की स्थिति भी सामने आई है. इसी वजह से पहले दर्ज करीब 3.79 करोड़ की आबादी का आंकड़ा घटकर अब लगभग 3.59 करोड़ के आसपास पहुंच गया है. सर्वे के दौरान यह भी सामने आया कि कई लोगों ने अपनी उप-जाति को ही जाति के तौर पर दर्ज कराया. इससे अलग-अलग जातियों की सही गणना करने में भी परेशानी हुई और इसके अलावा, राजस्थान के कई इलाकों से लोगों के दूसरे राज्यों में पलायन करने के कारण उनकी जानकारी जुटाने और आंकड़ों में शामिल करने में भी दिक्कतें सामने आईं.
अब जिला प्रमुख, मेयर और सरपंच की सीटों पर भी असर की आशंका
पंचायतीराज और स्थानीय निकाय चुनावों में ओबीसी आरक्षण कुल आबादी के अनुपात के आधार पर तय होता है. ऐसे में ओबीसी आबादी के आंकड़ों में कमी का असर जिला प्रमुख, प्रधान, सरपंच और मेयर जैसे अहम पदों के आरक्षण पर पड़ सकता है. आरक्षित सीटों की संख्या घटने पर ओबीसी उम्मीदवारों को सामान्य वर्ग की सीटों से चुनाव लड़ना पड़ सकता है. हालांकि, ओबीसी के लिए 21 प्रतिशत तक आरक्षण का प्रावधान है, लेकिन करीब 39 से 40 प्रतिशत पदों पर ओबीसी समाज के लोग काबिज बताए जाते हैं.
आबादी 50 प्रतिशत, लेकिन रिकॉर्ड में सिर्फ 30 प्रतिशत
मान लीजिए किसी क्षेत्र में ओबीसी आबादी 50 प्रतिशत है, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में यह आंकड़ा सिर्फ 30 प्रतिशत दर्ज है. ऐसे में स्थानीय निकायों में रोटेशन के आधार पर ओबीसी के लिए आरक्षित होने वाली सीटों की संख्या कम हो सकती है. इससे कई ऐसी पंचायतें और वार्ड, जो ओबीसी के लिए आरक्षित हो सकते थे, सामान्य या दूसरी श्रेणियों में जा सकते हैं.
2019 और 2026 के सदस्य सचिवों के अलग-अलग दावे
‘आयोग ने अनुमान और कई पैरामीटर के आधार पर काम किया था’
2019 में ओबीसी आयोग ने अनुमान के आधार पर आंकड़े तैयार किए थे. इसमें 2011 के सोशल इकोनॉमिक सर्वे की स्टडी समेत कई अन्य पैरामीटर को आधार बनाया गया था. मंडल कमीशन की वर्किंग और उससे जुड़े आंकड़ों को भी ध्यान में रखा गया था. इसके बाद ओबीसी सूची में कुछ नई जातियां भी जोड़ी गईं. वर्तमान आंकड़ों और आयोग की मौजूदा कार्यप्रणाली पर टिप्पणी करना उचित नहीं होगा.
- हरी कुमार गोदारा, पूर्व सदस्य सचिव, ओबीसी आयोग (2019)
‘कई पैरामीटर्स के आधार पर हुई ओबीसी परिवारों की गणना’
ओबीसी परिवारों की गणना के लिए अलग-अलग पैरामीटर्स का इस्तेमाल किया गया है. इनमें जनाधार कार्ड से मिले आंकड़ों को भी प्रमुख आधार बनाया गया. सर्वे के बाद सामने आए आंकड़े सरकार को भेज दिए गए हैं. ये आंकड़े अनुमानित हैं, यह बात पहले भी स्पष्ट की गई थी. पुराने और नए आंकड़ों की तुलना पर फिलहाल टिप्पणी नहीं कर सकता. अब आगे की प्रक्रिया सरकार के स्तर पर तय होगी.
- अशोक जैन, सदस्य सचिव, ओबीसी राजनीतिक प्रतिनिधित्व आयोग