मरने के बाद क्या सच में लौटे दोनों दोस्त? 1 साल बाद 12 घंटे के अंतर से जन्मे बेटे, जानिए क्या है सच?
ReporteR Sahab ,राज की बातें
Publised Date : Wednesday Oct 07, 2026
झरने में डूबे थे दो जिगरी दोस्त, एक साथ थम गई थी जिंदगी
मेड़ता क्षेत्र के मोकलपुर निवासी नरेंद्र बेड़ा और सातलावास निवासी नरेंद्र मुंवाल बचपन से ही गहरे दोस्त थे। दोनों की दोस्ती कक्षा 6 से शुरू हुई और 12वीं तक साथ पढ़ाई की। बाद में नर्सिंग की पढ़ाई के दौरान भी दोनों एक ही कॉलेज में पहुंचे और साथ रहे।
दरअसल, 14 जुलाई 2025 को दोनों दोस्त अपने तीसरे साथी जोधपुर निवासी प्रदीप विश्नोई के साथ चित्तौड़गढ़ के बस्सी स्थित निलिया महादेव झरने पर पिकनिक मनाने गए थे। इसी दौरान पानी के तेज बहाव में तीनों युवक डूब गए और उनकी मौत हो गई।
हादसे के बाद मोकलपुर और सातलावास समेत आसपास के क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। नरेंद्र बेड़ा का शव हादसे वाले दिन ही मिल गया था और उसका अंतिम संस्कार उसी दिन कर दिया गया। वहीं नरेंद्र मुंवाल का शव करीब 12 घंटे बाद मिला और अगले दिन अंतिम संस्कार किया गया।
एक साल बाद दोनों घरों में फिर गूंजी किलकारी
दोनों परिवारों के लिए यह हादसा बेहद दर्दनाक था। लेकिन करीब एक साल दो महीने बाद कहानी ने ऐसा मोड़ लिया, जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी।
मृतक नरेंद्र बेड़ा और नरेंद्र मुंवाल की माताओं ने नसबंदी करवा रखी थी। बाद में दोनों परिवारों ने जयपुर में नसबंदी खुलवाई। इसके बाद दोनों महिलाओं को संतान सुख प्राप्त हुआ और दोनों ने पुत्रों को जन्म दिया।
सबसे हैरान करने वाली बात दोनों बच्चों के जन्म का समय है। मोकलपुर निवासी बाबूलाल बेड़ा के घर 4 अक्टूबर की शाम करीब 7 बजे बेटे का जन्म हुआ। इसके ठीक 12 घंटे बाद, 5 अक्टूबर की सुबह करीब 9 बजे सातलावास निवासी सीताराम के घर बेटे ने जन्म लिया।
दोनों परिवारों के लिए यह पल बेहद भावुक करने वाला रहा। जिन घरों में कभी दो दोस्तों की मौत के बाद मातम पसरा था, उन्हीं घरों में अब बच्चों की किलकारियां गूंज रही हैं।
12 घंटे का संयोग बना पूरे इलाके में चर्चा का विषय
इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा चर्चा दोनों घटनाओं के बीच दिखाई दे रहे संयोग की हो रही है। नरेंद्र बेड़ा और नरेंद्र मुंवाल गहरे दोस्त थे और हादसे में दोनों की जान चली गई। उनके शव मिलने और अंतिम संस्कार के समय में भी करीब 12 घंटे का अंतर रहा था।
अब करीब एक साल बाद उनकी माताओं के यहां जन्मे दोनों बेटों के जन्म में भी महज 12 घंटे का अंतर है। इसी संयोग ने इस घटना को और खास बना दिया है।
परिजन इसे अपने-अपने नजरिए से देख रहे हैं। कोई इसे कुदरत का करिश्मा बता रहा है तो कोई महज संयोग मान रहा है। हालांकि वैज्ञानिक तौर पर पुनर्जन्म का दावा इस घटना से साबित नहीं होता, लेकिन दो परिवारों के लिए यह संयोग निश्चित तौर पर बेहद भावुक और यादगार है। बचपन से साथ रहे दोनों दोस्तों की कहानी और अब उनके परिवारों में लगभग एक जैसे समय पर हुई खुशियों की वापसी पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी हुई है।